चुनाव आयोग और उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों के मसले हमारे देश में हर तरह के राजनीतिक-प्रशासनिक सुधार के लिए बेहद जरूरी हो गये हैं। संवैधानिक दृष्टि से भी ये दोनों निकाय महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इनके उच्च पदों पर होने वाली नियुक्तियों की प्रक्रिया बेहद अलोकतांत्रिक, संकीर्ण, सतही और अपारदर्शी किस्म की है। ऐसा क्यों है? आश्चर्यजनक है कि अतीत में इन दोनों क्षेत्रों के लिए ज्यादा गंभीरता के साथ नहीं सोचा गया। सबसे अद्यतन जो प्रयास हुआ, उससे कुछ नया नहीं निकला। यह प्रयास सन् 2023 का था। केंद्र की मौजूदा मोदी सरकार ने चुनाव आयोग के आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में अपनी पसंद का बदलाव किया। इस अधिनियम की जड़ें सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले में निहित हैं, जो अनूप बर्नवाल बनाम भारत संघ मुकदमे में आया था।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने तब अनुच्छेद-324 का हवाला देते हुए कहा था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद के जरिये ठोस कानून बनाया जाना चाहिए। अंतरिम व्यवस्था के तौर पर कोर्ट ने कहा था, जब तक नया कानून नहीं बन जाता तब तक तीन सदस्यों की कमेटी आयुक्तों की नियुक्ति का प्रस्ताव करेगी। उक्त कमेटी में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के अलावा देश के मुख्य न्यायाधीश रहेंगे। कुछ ही समय बाद मोदी सरकार ने उक्त अंतिरम व्यवस्था से पिंड छुड़ाया और ‘ज्यादा सरकारी प्रभाव वाली कमेटी’ के गठन का कानून पारित करा लिया।
इसमें प्रधानमंत्री के साथ उनकी पसंद का दूसरा मंत्री और विपक्ष के नेता कुल तीन सदस्य रखे गये। तब से इसी कमेटी के जरिये आयुक्तों की नियुक्ति होती आ रही है। इसमें विपक्ष के नेता को महज असहमति व्यक्त करने की औपचारिकता निभानी होती है। इस व्यवस्था को भी चुनौती दी गई। पिछले दिनों जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस सी शर्मा की बेंच ने इस पर विचार किया लेकिन दोनों जजों में असहमति के चलते कोई फैसला नहीं हो सका। सिर्फ ये सहमति बनी कि इसे आगे के विचार के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष में रखा जाय। तबसे मामला मुख्य न्यायाधीश के विचारार्थ लंबित है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर बहस या विवाद सिर्फ आज की बात नहीं है। संविधान सभा में भी इस पर काफी लंबी चर्चा हुई थी। चर्चा का समापन करते हुए डॉ बी आर अम्बेडकर ने कुछ महत्वपूर्ण सुझाव दिये थे। लेकिन तब उस पर सरकार ने गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया। शायद, सरकार में बैठे लोगों को अनुमान नहीं था कि भविष्य के चुनाव आयोग में कैसे-कैसे लोग आयेंगे और देश में लोगों के अंदर उन्हें लेकर किस तरह भारी विभाजन होगा। राजनीतिक दलों के बीच कैसे-कैसे विवाद उठेंगे और न्यायपालिका भी उन्हें सुलझाने में असफल नजर आयेगी। भारत की उच्च न्यायपालिका स्वयं ही समस्याग्रस्त है। चुनाव आयोग की तरह उस पर निष्पक्ष और पारदर्शी न होने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। ऐसे में वह आयोग के विवादों का भला कैसे समाधान करे!
चुनाव आयोग और उच्च न्यायपालिका, दोनों की समस्या के मूल में है, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया। जब तक दोनों निकायों में नियुक्ति की प्रक्रिया को वस्तुपरक, अपेक्षाकृत निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं बनाया जाता, तब तक समस्या का समाधान संभव नहीं है। उच्च न्यायपालिका में जिस कॉलेजियम सिस्टम के जरिये जजों की नियुक्ति होती है, उससे ज्यादा अन्यायपूर्ण नियुक्ति-प्रक्रिया और क्या हो सकती है? इसमें कुछ वरिष्ठ जज ही जजों की नियुक्त करते हैं। उनका प्रस्ताव सरकार के पास जाता है और फिर अनौपचारिक विमर्श के बाद राष्ट्रपति के यहां से जजों की नियु्क्ति की अधिसूचना जारी की जाती है।
यह तय करना मुश्किल है कि जजों और आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में कौन ज्यादा पक्षपात-पूर्ण और अन्यायपूर्ण है! इसलिए दोनों निकायों में नियुक्ति की प्रक्रिया को बदले बगैर दोनों में बड़े सुधार की कोई संभावना नहीं है। कुछ वर्ष पहले उच्च न्यायपालिका के लिए जिस नेशनल जुडिसियल एप्वाइंटमेंट कमीशन(एनजेएसी) के गठन का विकल्प आया था। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। अगर एनजेएसी की संरचना को सरकार के दबाव से मुक्त रखा जाय और उसमें आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों को लागू करके कानून बनाया जाय तो बात बन सकती है और वह कॉलेजियम सिस्टम का विकल्प बन सकती है।
जहां तक चुनाव आयोग का सवाल है, उसका सबसे बेहतरीन विकल्प हमारे देश की महान् संविधान सभा में ही सुझाया गया था। और वह सुझाव किसी और की तरफ से नहीं, संविधान के प्रारूप लेखन समिति के अध्यक्ष
डॉ अम्बेडकर की तरफ से आया था। उन्होंने कुछ अन्य सदस्यों की राय को शामिल करते हुए 16 जून, 1949 को बहुत विस्तार से वह सुझाव रखा। चुनाव आयोग के आयुक्तों की नियुक्ति बारे में प्रो शिब्बन लाल सक्सेना और अन्य सदस्यों के विचारों के संदर्भ में उन्होंने कहा थाः ‘चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में उनके सुनिश्चित और निर्धारित कार्यकाल आदि के बारे में फैसला करने का ज्यादा औचित्य नहीं, अगर हम ठोस प्रावधानों के जरिये यह सुनिश्चित नहीं करते कि चुनाव आयोग में कोई मूर्ख, धूर्त या कार्यपालिका के अंगूठे के नीचे काम करने वाला न आ सके। हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि इस प्रावधान में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी अयोग्य व्यक्ति को मुख्य निर्वाचन आयुक्त या आयुक्त के रूप में नियुक्त किये जाने से रोक सके। यही वो मसला है, जिससे मैं परेशान हूं और यह हमारी सभा को भी परेशान करना वाला होगा।’
डॉ अम्बेडकर ने अपनी इसी ऐतिहासिक स्पीच में अमेरिकी संविधान का हवाला दिया और कहा कि किस तरह अमेरिकी संविधान के निर्माताओं ने अपने वहां की चुनाव कराने वाली संस्था के उच्चाधिकारियों की नियुक्ति सम्बन्धी मसले को अनुच्छेद-2 के सेक्शन-2 में महत्वपूर्ण प्रावधान करके हल किया था। इसके मुताबिक वहां राष्ट्रपति तब तक चुनाव की संस्था के उच्चाधिकारियों की नियुक्ति को फाइनल नहीं कर सकते, जब तक कि उनके प्रस्तावित नामों को वहां की सीनेट की मंजूरी नहीं मिल जाती।’ सवाल उठता है, हमारे यहां ऐसा क्यों नहीं हो सका? अगर तब ऐसा नहीं हो सका तो आज क्यों नहीं किया जा रहा है? आज कम से कम इसकी पुरजोर मांग क्यों नहीं उठ रही है ? भारत के चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए इससे बेहतर प्रावधान और कुछ भी नहीं हो सकता, जिसकी तरफ डॉ अम्बेडकर ने 16 जून1949 को समूची संविधान सभा का ध्यान आकर्षित किया था।
इसमें किसी महान् संविधान-विशेषज्ञ की जरूरत नहीं है जो हमारे देश में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले सन् 2023 के कानून की समीक्षा करे और बताये कि यह कितना सही और कितना गलत है! कोई आम आदमी भी बता देगा कि यह कानून सत्तापक्ष की तरफ झुका हुआ है। अगर आयुक्तों की नियुक्ति और उनके नामों का प्रस्ताव करने वाली कमेटी में सिर्फ तीन ही सदस्य हैं-प्रधानमंत्री, उनकी तरफ से प्रस्तावित उनकी कैबिनेट का एक मंत्री और लोकसभा में विपक्ष का नेता तो यह बात आईने की तरह साफ है कि हर हालत में वे ही लोग चुनाव आयुक्त बनेंगे जो की सत्ता-पक्ष, खासतौर पर प्रधानमंत्री और उनकी पसंद के मंत्री को पसंद होंगे। राष्ट्रपति की तरफ से उन्हीं नामों पर मुहर लग जायेगी और विधिवत अधिसूचना जारी हो जायेगी। मोदी-राज में यही हो रहा है। 2023 में इस आशय का कानून बनने से पहले कुछ समय के लिए सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर तीन सदस्यों की कमेटी में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ तीसरे सदस्य के रूप में देश के मुख्य न्यायाधीश को रखने का फैसला हुआ था। पर वह कानून बनने तक के लिए एक तदर्थ व्यवस्था थी। इसके बाद निरस्त हो गई।
आज फिर इस कमेटी पर सोचने का वक्त आ गया है। अगर अपेक्षाकृत एक निष्पक्ष किस्म के चुनाव आयोग के गठन को असलियत बनाना है तो फिर प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की तीन सदस्यीय कमेटी को बहाल करना होगा। इस कमेटी का अधिकार सिर्फ प्रस्तावित करने तक सीमित रहना चाहिए। तीन सदस्यों के चुनाव आयोग के लिए उन्हें तीन की जगह छह नाम प्रस्तावित करने को कहा जाना चाहिए। इन छह नामों को फिर लोकसभा में पेश किये जाने का प्रावधान हो और सदन के दो-तिहाई बहुमत के जरिये तीन आयुक्तों के नाम तय किये जाने चाहिए।
जहां तक मैं समझता हूं, डॉ बी आर अम्बेडकर चुनाव आयोग के गठन के लिए इसी तरह के प्रक्रिया के पक्षधर थे। इसी वजह से उन्होंने संविधान सभा के अपने भाषण में अमेरिकी संविधान के प्रावधानों का खासतौर पर जिक्र किया। आज जब अपने देश में चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था होने के बावजूद बेहद विवादास्पद और अविश्वसनीय किस्म की संस्था में तब्दील हो गया हो, इसके पुनर्गठन के प्रस्ताव पर देश में आम सहमति बनाने की कोशिश की जानी चाहिए। देश में लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए यह बेहद जरूरी हो गया है। किसी एक आयुक्त के इस्तीफे से फौरी तौर पर कुछ राहत मिल सकती है या कुछ संतुष्टि हो सकती है लेकिन चुनाव आयोग को निष्पक्ष और पारदर्शी संस्था बनाने के लिए आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में रेडिकल संशोधन के बगैर काम नहीं चलेगा। क्या हमारे देश का सत्ता-पक्ष और विपक्षी दल इसके लिए तैयार हैं?
(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं।)